पाकिस्तान–अफ़ग़ानिस्तान संघर्ष: एक विश्लेषण
पाकिस्तान-अफ़ग़ानिस्तान संबंधों का इतिहास कई उतार-चढ़ावों एवं चुनौतियों से भरा रहा है. फरवरी 2026 में पाकिस्तानी सेना द्वारा चलाए गए “ऑपरेशन ग़ज़ब-लिल –हक़” के जवाब में अफ़ग़ानिस्तान ने “ऑपरेशन रद्द-अल-ज़ुल्म” का आगाज़ किया जिसके फलस्वरूप द्विपक्षीय संबंध गर्त में समाने लगे हैं. पाकिस्तान अपने सैन्य ऑपरेशन को न्यायोचित ठहराने के लिए तहरीक-ए-तालिबान पाकिस्तान (टी.टी.पी.), जिसे वह “फितना-अल-ख्वारिज़” के नाम से संबोधित करता है, की अफ़ग़ानिस्तान के सीमान्त इलाकों में उपस्थिति तथा वहाँ मिलने वाले प्रत्यक्ष/अप्रत्यक्ष समर्थन को रेखांकित करता है. पाकिस्तानी ऑपरेशन के पीछे का वास्तविक कारण तालिबान प्रशासन का उनकी उँगलियों पर नाचने से इंकार करना प्रतीत होता है.
पाकिस्तान–अफ़ग़ानिस्तान द्विपक्षीय संबंधों का इतिहास काफी उतार चढाव वाला रहा है. वर्ष 1947 में जब पाकिस्तान अपने स्वतंत्र अस्तित्व की पुष्टि के लिए संयुक्त राष्ट्र संघ की सदस्यता का आकांक्षी था तो अफ़ग़ानिस्तान एक मात्र ऐसा देश था जिसने इसका प्रत्यक्ष रूप से विरोध किया था. सोवियत संघ द्वारा 1979 में किए गए हस्तक्षेप के दौरान बदली हुई परिस्थिति में पाकिस्तान “अफ़ग़ान जिहाद” का इन्चार्च बन गया. लगभग एक दशक तक चले इस “पवित्र युद्ध” में अमेरिका, सऊदी अरब व अन्य देशों से प्राप्त आर्थिक और सैन्य मदद को पाकिस्तान ने विभिन्न संगठनों में न केवल बाँटा बल्कि उन्हें अपनी जमीन पर जरुरी प्रशिक्षण भी दिया. इन सबका सम्मिलित परिणाम यह हुआ कि सोवियत संघ जैसी महाशक्ति को इस क्षेत्र से खाली हाथ वापस जाना पड़ा. सोवियत संघ के 1989 में अफ़ग़ानिस्तान से हट जाने से खाली हुआ पॉवर वैक्यूम को भरने और काबुल की सत्ता पर काबिज़ होने के लिए एक बड़ा गृहयुद्ध छिड़ गया. पाकिस्तान के सभी संगठनों से रिश्ते थे लेकिन इस गृहयुद्ध में जो समर्थन मुल्ला उमर के तालिबान को मिला वैसा किसी अन्य संगठन को प्राप्त नहीं हुआ इसी कारण से जल्द ही अफ़ग़ान तालिबान ने काबुल की सत्ता हथिया ली.
इस रिश्ते की कठिन परीक्षा उस समय हुई जब 2001 में अमेरिका ने 9/11 हमलों के तार अफ़ग़ानिस्तान-पाकिस्तान से जोड़े और अमेरिकी उप रक्षा सचिव रिचर्ड आर्मिटेज ने पाकिस्तान को पाषाणकाल में पहुँचाने की धमकी दी. जनरल मुशर्रफ के नेतृत्व में पाकिस्तान ने अमेरिकी “आतंकवाद के विरुद्ध वैश्विक युद्ध” में भाग लेने की सहमति तो दी, लेकिन तालिबान से अपने रिश्ते समाप्त नहीं किए और उन्हें अप्रत्यक्ष रूप से और चोरी-छिपे समर्थन करता रहा. यह एक ऐसा समय था जब पाकिस्तान और तालिबान दोनों को एक दुसरे की आवश्यकता था. तालिबान को स्वयं को बचाए रखने और अमेरिकी फौजों से लड़ने के लिए पाकिस्तानी मदद कि ज़रुरत थी तो वहीँ पाकिस्तान को अफगानिस्तान में “स्ट्रेटेजिक डेप्थ” बनाए रखने तथा पूरे क्षेत्र में घृणित कार्यकर्म को जारी रखने के लिए तालिबान की मदद की ज़रूरत थी.
तालिबान 2.0 और पाकिस्तान
अगस्त 2001 में अमेरिकी फौजों के अफ़ग़ानिस्तान से निकल जाने पर तालिबान को पाकिस्तान की अब उतनी ज़रूरत नहीं रही जैसी कि पहले थी. लेकिन पाकिस्तान को अब भी तालिबान की आवश्यकता थी. अमेरिकी फौजों के जाने के तुरंत बाद पाकिस्तानी ख़ुफ़िया एजेन्सियां न केवल पूरी तरह सक्रिय हो गईं बल्कि अपनी भविष्य की रणनीतियों पर काम करना भी प्रारंभ कर दिया. पाकिस्तान ने इस मौके पे जश्न भी मनाया लेकिन यह जश्न ज्यादा समय तक चल नहीं सका. तालिबान अपने नए अवतार में पहले से अधिक अनुभवी और यथार्थवादी हो गए थे. अब उन्हें इस बदली हुई दुनिया के कुछ कूटनीतिक और रणनीतिक दाँव-पेंचों का भी ज्ञान हो चुका था और वह यह बात भी जान चुके थे कि उनकी पुरानी नीतियाँ उन्हें वैश्विक मंच पर अलग-थलग कर देंगी. इसलिए उन्होंने यह तय किया कि वह अपनी जमीन का उपयोग किसी भी देश को किसी अन्य देश के खिलाफ साजिश रचने में नहीं करने देंगे.
काबुल की सत्ता पर काबिज़ होने के बाद अपनी पहले ही संवाददाता सम्मलेन में 17 अगस्त 2021 को तालिबान प्रवक्ता ज़बिउल्ला मुजाहिद ने स्पष्टतः कहा कि तालिबान अन्य देशों के साथ शांतिप्रिय सम्बन्ध की कामना करते हैं और किसी भी संगठन को अफ़ग़ानिस्तान की जमीन का उपयोग किसी देश पर हमले के लिए नहीं करने दिया जाएगा.[1] उनके इस कदम का सभी ने खुले मन से स्वागत किया. लेकिन पाकिस्तान में इसको लेकर मातम जैसी स्थिति हो गयी. पाकिस्तान ने इसे अपनी भू-राजनीतिक महत्वाकांक्षाओं एवं क्षेत्रीय उद्देश्यों की राह में एक बड़े रोड़े की तरह देखा. इन सबके अतिरिक्त जल्द ही तालिबान ने स्पष्ट कर दिया कि वह तहरीक-ए-तालिबान पाकिस्तान (टी.टी.पी.) की अफ़ग़ानिस्तान में उपस्थिति के मामले में पाकिस्तान की चिंताओं का उसकी अपेक्षाओं के अनुरूप कोई समाधान नहीं करेगा. इसलिए जल्द ही दोनों देशों के द्विपक्षीय संबंधों में तनाव उत्पन्न हुआ जो आगे चलकर एक संघर्ष के रूप में सामने आ गया.
पाकिस्तान अब खुले रूप से तालिबान पर आरोप लगाने लगा कि वह टी.टी.पी., जिसे पाकिस्तान “फितना-अल-ख्वारिज़” कहकर संबोधित करता है, को न केवल अफ़ग़ानिस्तान में पनाह देता है बल्कि उसे जरुरी मदद भी पहुँचाता है. ऐसा माना जाता है की पाकिस्तानी सीमा से सटे कम से कम चार अफ़ग़ान प्रान्तों—कुनार, निंगरहार, खोस्त, और पक्तिका—में टी.टी.पी. सक्रिय है और वहाँ से पाकिस्तान के खैबर पख्तुन्ख्वा प्रान्त व अन्य जगहों पर हमले करता है. वर्ष 2024 में सीनेट की एक कमेटी को दी गयी एक रिपोर्ट में पाकिस्तानी विदेश मंत्री एवं उप प्रधानमंत्री इशाक डार ने इंगित किया था कि टी.टी.पी. पाकिस्तान को अस्थिर करना चाहता है तथा इसके चीन से संबंधों को अस्त-व्यस्त करना चाहता है. पाकिस्तान ने टी.टी.पी. के मुद्दे को लेकर अफ़ग़ानिस्तान पर लगातार दबाव बनाने का प्रयास किया लेकिन तालिबान ने हमेशा ही अपने आधिकारिक वक्तव्यों में इसे पाकिस्तान का आंतरिक मामला बताया. साथ ही उन्होंने यह भी आरोप लगाया कि पाकिस्तान इस्लामिक स्टेट ऑफ़ खोरासन प्रोविंस (आई.एस.के.पी.) को अपने यहाँ पनाह देता है जो अक्सर अफ़ग़ानिस्तान पर हमले करते हैं. हालाँकि कुछ मीडिया रिपोर्ट्स इस तरफ भी इशारा करती हैं कि तालिबान ने पाकिस्तान और टी.टी.पी. के बीच बात-चीत भी कराई थी जो........
