जनाकांक्षाओं के शिल्पी और संवेदना के प्रतीक थे चंद्रशेखर
भारतीय राजनीति के उज्ज्वल नक्षत्रों में चंद्रशेखर जी का स्थान विशिष्ट है. समय के अनेक उतार-चढ़ाव आए, सत्ता बदली, राजनीतिक समीकरण बदले, पर उनकी आभा कभी धूमिल नहीं हुई. उनके प्रशंसकों की संख्या असंख्य थी और प्रत्येक व्यक्ति यह विश्वास करता था कि चंद्रशेखर उसे सबसे अधिक स्नेह करते हैं. सच तो यह है कि हर व्यक्ति के पास अपने-अपने चंद्रशेखर थे, अपनी-अपनी स्मृतियां थीं और अपने-अपने किस्से.
ऐसा सौभाग्य विरले ही किसी राजनेता को प्राप्त होता है. उनका व्यक्तित्व गहन संवेदनशीलता, निष्कपटता और सहज आत्मीयता का अद्भुत संगम था. उनसे एक बार मिलने वाला व्यक्ति पुनः उनसे मिलने की इच्छा अवश्य करता. उनकी वाणी में मिट्टी की सोंधी सुगंध बसती थी. जब वे भोजपुरी और हिंदी का सहज मिश्रण करते हुए बोलते, तो शब्द सीधे हृदय में उतर जाते. वे कठिन से कठिन बात भी अत्यंत सरलता से कहते थे. उनके विचारों में दृढ़ता, वैज्ञानिक दृष्टि और नैतिक स्पष्टता का अद्भुत संतुलन दिखाई देता था. वे ऐसे निर्भीक व्यक्तित्व थे जिन्होंने जीवन भर किसी भी प्रकार के दबाव के आगे समझौता करना स्वीकार नहीं किया. लोग उन्हें आदरपूर्वक अध्यक्षजी कहकर संबोधित करते थे, जबकि मैं उन्हें स्नेह से भइया कहता था.
चंद्रशेखर से पहली मुलाकात
उनसे मेरी पहली भेंट बिहार आंदोलन के दौरान पटना की महिला चरखा समिति........
