आदिवासियों को देश के विकास का सहयात्री बनाना ही होगा, पढ़ें मोयुरी घोष का आलेख
वर्ष 2047 में देश ‘विकसित भारत’ के रूप में खड़े होने का लक्ष्य रख रहा है, किंतु कोई भी महान इमारत उतनी ही मजबूत होती है, जितनी मजबूत उसकी नींव होती है. आज देश की करीब 10.45 करोड़ आदिवासी आबादी, जो 700 से अधिक अनुसूचित जनजातीय समुदायों में बंटी है, चुनौतीपूर्ण परिस्थितियों में जीवन बिता रही है. अनुसूचित जनजातियां देश की कुल आबादी का 8.6 प्रतिशत हैं और वे उन भू-भागों में निवास करती हैं, जो प्राकृतिक संसाधनों से संपन्न हैं. झारखंड, ओडिशा, छत्तीसगढ़, मध्य प्रदेश तथा पूर्वोत्तर के वन, पहाड़ और खनिज क्षेत्र भारत की औद्योगिक अर्थव्यवस्था की रीढ़ हैं. जिन वनों की रक्षा उन्होंने सदियों से की है, उन्हें आज वैश्विक स्तर पर महत्वपूर्ण 'कार्बन सिंक' के रूप में मान्यता प्राप्त है. इसके बावजूद यह समुदाय आज भी सबसे निचले पायदान पर खड़ा दिखाई देता है. उनकी साक्षरता दर राष्ट्रीय औसत से काफी कम है, शिशु मृत्यु दर चिंताजनक रूप से अधिक है, बच्चों में कुपोषण व्यापक है और पारिवारिक आय का स्तर बेहद कम है. गुणवत्तापूर्ण स्वास्थ्य सेवाएं, माध्यमिक शिक्षा और औपचारिक बैंकिंग सुविधाएं आज भी उनके लिए एक सुदूर सपना हैं.
भारतीय राज्य ने आदिवासी कल्याण के लिए प्रयास किये........
