शहादत दिवस : 25 मार्च : कायरों की तरह नहीं जीना चाहते थे गणेशशंकर...
Ganesh Shankar Vidyarthi: इस देश में स्वतंत्रता के आराधकों की लंबी परंपरा में गणेशशंकर विद्यार्थी का नाम अलग से रेखांकित किया जाता है, क्योंकि वह मतभेद या विचारभेद को स्वतंत्रता संघर्ष के आड़े आने देने के खिलाफ थे. वह कहते थे कि स्वतंत्रता का लक्ष्य पाने के लिए संघर्ष के औजार व हथियार परिस्थितियों के अनुसार अपनाये व बदले जा सकते हैं. कानपुर को कर्मभूमि बनाने और मजदूर नेता के रूप में सार्वजनिक जीवन शुरू करने के साथ वह लेखक/पत्रकार और ‘प्रताप’ (पहले साप्ताहिक, फिर दैनिक) के संपादक व संचालक बने, तो भी उन्होंने कांग्रेस या महात्मा गांधी के अहिंसक और क्रांतिकारियों के सशस्त्र क्रांतिकारी संघर्षों का एक जैसा समर्थन किया. उनका सारा जोर इस पर था कि स्वतंत्रता संघर्ष के जितने भी रास्ते हो सकते हों, उनमें किसी को भी वीरान न रहने दिया जाये और परिस्थिति के अनुसार हर तरह की रणनीतियां इस्तेमाल की जायें. उनके निकट अहिंसा भी एक रणनीति थी और सशस्त्र संघर्ष भी.
जब तक वह रहे, कानपुर स्थित ‘प्रताप’ कार्यालय क्रांतिकारियों द्वारा पहचान छिपाकर रहने, छद्म नाम से लिखने व काम करने का केंद्र........
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