शिक्षा और रोजगार के बीच की दूरी कम करना जरूरी
भारत में शिक्षा केवल रोजगार प्राप्त करने का साधन नहीं है, बल्कि यह व्यक्ति की सोच, समझ, नागरिक चेतना और सामाजिक भागीदारी को विकसित करने की एक व्यापक प्रक्रिया है. एक ऐसे नागरिक का निर्माण करना है जो प्रश्न कर सके, तर्क कर सके और समाज में रचनात्मक योगदान दे सके. किंतु, आधुनिक भारत में शिक्षा, आकांक्षा और रोजगार के बीच एक गहरा विरोधाभास उभरकर सामने आया है, शिक्षा का विस्तार हुआ है, पर उसका जीवन, अर्थव्यवस्था और सामाजिक अवसरों से जुड़ाव अपेक्षाकृत कमजोर हुआ है. बीते दो दशकों में, भारत ने शिक्षा के क्षेत्र में उल्लेखनीय विस्तार किया है.
विद्यालयों तक पहुंच लगभग सार्वभौमिक हुई है, उच्च शिक्षण संस्थानों की संख्या बढ़ी है और राष्ट्रीय शिक्षा नीति-2020 ने शिक्षा को बहु-विषयक व कौशलोन्मुख बनाने की दिशा में कदम बढ़ाया है. लेकिन नीति आयोग, असर, विश्व बैंक और यूनेस्को की रिपोर्टें लगातार संकेत दे रही हैं कि भारत की अगली चुनौती केवल शिक्षा तक पहुंच नहीं, बल्कि सीखने की गुणवत्ता, बुनियादी दक्षता और वास्तविक जीवन में इसकी उपयोगिता है. आज मूल प्रश्न यह नहीं है कि कितने बच्चे विद्यालय जा रहे हैं, बल्कि यह है कि वे वहां से क्या सीख कर निकल रहे हैं. क्या प्राथमिक स्तर पर उनकी........
