गृहिणी के योगदान को आर्थिक मूल्य देना न्यायसंगत, पढ़ें देवांशु श्रीवास्तव का आलेख
प्रो (डॉ) देवांशु श्रीवास्तव, नेशनल यूनिवर्सिटी ऑफ स्टडी एंड रिसर्च इन लॉ, रांची में विधि के प्रोफेसर
Supreme Court: भारतीय समाज में गृहिणी को सदैव परिवार की धुरी माना गया है. वह घर संभालती है, बच्चों का पालन-पोषण करती है, बुजुर्गों की देखभाल करती है, परिवार की जरूरतों का प्रबंधन करती है और अनेक बार परिवार के प्रत्येक सदस्य के लिए भावनात्मक सहारा भी बनती है. फिर भी उसके श्रम को अक्सर आर्थिक दृष्टि से शून्य माना जाता रहा है. हाल ही में सुप्रीम कोर्ट द्वारा गृहिणी के योगदान का मूल्यांकन करते हुए उसे प्रतिमाह 30 हजार रुपये के बराबर मानना केवल एक न्यायिक निर्णय नहीं, बल्कि भारतीय समाज की सोच में परिवर्तन का संकेत है. न्यायालय ने कहा कि गृहिणियां केवल घर नहीं संभालतीं, बल्कि वे ‘राष्ट्र निर्माता’ हैं. यह उस वास्तविकता की स्वीकारोक्ति है, जिसे लंबे समय से नजरअंदाज किया जाता रहा है. किसी भी राष्ट्र की सबसे महत्वपूर्ण इकाई परिवार है और परिवार के सुचारु संचालन में गृहिणी की भूमिका केंद्रीय होती है.
भारत सहित विश्व के अधिकांश देशों में सकल घरेलू उत्पाद की गणना केवल उन गतिविधियों को ध्यान में रखकर की जाती है, जिनका प्रत्यक्ष आर्थिक लेनदेन होता है. घर के भीतर किये जाने वाले श्रम, चाहे वह भोजन बनाना हो, बच्चों........
