जनजातीय खेल प्रतिभाएं राष्ट्रीय गौरव हैं, पढ़ें राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू का आलेख
Khelo India Tribal Games 2026: मैंने देखा है कि ग्रामीण क्षेत्रों और वनांचलों में बच्चे घर के बाहर प्रकृति के सान्निध्य में अधिक समय बिताते हैं. वे खेल-कूद के सहज तरीके खोज लेते हैं. वे मिट्टी में लकीरें खींचकर और आकृतियां बनाकर, खेलने की जगह तैयार कर लेते हैं. वे फलों के सूखे बीजों का खेल की गोटियों की तरह इस्तेमाल कर लेते हैं. सूखे पत्तों, पेड़ों की जड़ों और फटे-पुराने कपड़ों से गेंद बना लेते हैं. बांस का उपयोग कर वे हॉकी और फुटबॉल के गोल पोस्ट बना लेते हैं. इस प्रकार अनेक प्राकृतिक वस्तुओं का उपयोग कर वे अपने खेल संसार की रचना कर लेते हैं. बहुत से बच्चे बिना जूते और जर्सी के पूरे जोश से खेलते रहते हैं. पोखरों-तालाबों में बच्चे खूब तैरते रहते हैं. तैराकी की इस सहज प्रतिभा को अब उपलब्ध प्रशिक्षण और संसाधनों की सहायता से विकसित कर केवल 15 वर्ष की जाजपुर की बेटी अंजलि मुंडा ने प्रथम ‘खेलो इंडिया जनजातीय खेल 2026’ में पहले ही दिन तीन स्वर्ण पदक जीत कर पूरे देश के युवाओं को प्रेरित किया.
तीरंदाजी के प्रति जनजातीय लोगों में सहज तरंग-सी होती है. संताल समुदाय ने 1855 में शोषण के विरुद्ध एक घनघोर संग्राम किया था जो ‘संताल हूल’ के नाम से अमर है. आधुनिक हथियारों से लैस ब्रिटिश सेना ने उस क्रांति को दबा तो दिया, पर अपने विवरणों में अंग्रेजों ने संताल वीरों के युद्ध कौशल, खासकर तीरंदाजी का विशेष उल्लेख किया है. संताल हूल का नेतृत्व करने वाले बहादुर भाइयों सिदो-कान्हू तथा चांद-भैरव एवं वीरांगना बहनों, फूलो-झानो की प्रतिमाओं का झारखंड में उनके गांव उरी-मारी में जाकर अनावरण करने का सौभाग्य मुझे तब मिला था, जब मैं राज्यपाल थी. तीरंदाजी में एकलव्य की महानता से देश का बच्चा-बच्चा परिचित है. वे श्रेष्ठतम धनुर्धर के रूप में सम्मानित हैं. एकलव्य, सभी देशवासियों के लिए,........
