ब्लू इकोनॉमी के जरिये टिकाऊ अर्थव्यवस्था की ओर
-पार्थो प्रतिम चटर्जी,फेलो, रॉयल जीयोग्राफिकल सोसायटी (यूके)-
वैश्विक अर्थव्यवस्था आज ऐसे मोड़ पर है, जहां जमीन के संसाधन लगातार सिमटते जा रहे हैं और मिट्टी की घटती उर्वरता से दुनिया का ध्यान पृथ्वी के उस सत्तर प्रतिशत हिस्से की ओर जा रहा है, जो पानी से ढका है. पारंपरिक रूप से हमारी अर्थव्यवस्था जमीन केंद्रित रही है, पर दुनिया अब एक दूरदर्शी बदलाव के रूप में समुद्री संसाधनों के एकीकरण और पर्यावरण शासन की तरफ बढ़ रही है, जिसे हम ब्लू इकोनॉमी कहते हैं.
विश्व बैंक के अनुसार, ब्लू इकोनॉमी का अर्थ महासागरीय पारिस्थितिकी तंत्र के स्वास्थ्य को सुरक्षित रखते हुए आर्थिक विकास, बेहतर आजीविका और नौकरियों के लिए समुद्री संसाधनों का सतत उपयोग है. यह केवल समुद्र से पारंपरिक तरीकों से तेल निकालने या मछली पकड़ने तक सीमित नहीं है. यह ऐसा वैज्ञानिक खाका है, जो समुद्री विकास को पर्यावरण के नुकसान से पूरी तरह अलग करता है, ताकि औद्योगिक उत्पादन को बढ़ाते हुए डेल्टा, तटीय आर्द्रभूमि और एस्चुअरी इकोटोंस जैसे संवेदनशील क्षेत्रों को बचाया जा सके. जमीन पर आधारित सौर या पवन ऊर्जा के साथ सबसे बड़ी समस्या उनकी अनिश्चितता होती है. जबकि इसके विपरीत, समुद्री संसाधन कहीं अधिक घने और अनुमानित........
