पश्चिम एशिया में भारत की कूटनीतिक परीक्षा
-समीर भट्टाचार्य, एसोसिएट फेलो, ऑब्जर्वर रिसर्च फाउंडेशन-
अमेरिका और ईरान के बीच हालिया संघर्ष में हुई बढ़ोतरी पश्चिम एशिया की भू-राजनीति में एक निर्णायक बदलाव का संकेत देती है. यह स्थिति जितनी चिंताजनक है, उतनी ही गंभीर भी है. शुरुआत में पश्चिम एशिया का यह टकराव एक सीमित सैन्य संघर्ष जैसा प्रतीत हो रहा था, लेकिन अब यह एक व्यापक रणनीतिक प्रतिस्पर्धा में बदल चुका है, जिसमें समुद्री सुरक्षा, क्षेत्रीय प्रभाव, ऊर्जा आपूर्ति और पश्चिम एशिया में शक्ति संतुलन का भविष्य शामिल है. वॉशिंगटन और तेहरान द्वारा हाल ही में एक-दूसरे पर किये गये हमलों ने यह उम्मीद समाप्त कर दी है कि जून के मध्य में हस्ताक्षरित सहमति पत्र स्थायी शांति का आधार बनेगा.
इसके बजाय, यह क्षेत्र फिर से एक लंबे संघर्ष के कगार पर खड़ा है, जिसके परिणाम फारस की खाड़ी से कहीं आगे तक जायेंगे. जाहिर है कि शांति की जो उम्मीद बनती दिख रही थी, वह टूट रही है. अमेरिका के ताजा हमलों का लक्ष्य ईरान की सैन्य अवसंरचना थी, जिसमें वायु रक्षा प्रणाली, मिसाइल भंडार, नौसैनिक ठिकाने, तटीय निगरानी प्रतिष्ठान और लॉजिस्टिक केंद्र शामिल थे. वॉशिंगटन ने इस कार्रवाई को एक आवश्यक कदम बताया, जिसका उद्देश्य ईरान की उस क्षमता को कमजोर करना था, जिससे वह होर्मुज जलडमरूमध्य के माध्यम से गुजरने वाले वाणिज्यिक जहाजों को खतरे में डाल सकता है. ईरानी सरकारी मीडिया ने बंदर अब्बास, चाबहार और बुशहर सहित कई महत्वपूर्ण सैन्य और बंदरगाह शहरों में विस्फोटों की पुष्टि की, जिससे हमलों के पैमाने और भौगोलिक विस्तार का पता चलता है.
इस्लामिक रिवोल्यूशनरी गार्ड कॉर्प्स ने तेजी से जवाब देते........
